जिंदगी में केवल चार दिन है और वे चार दिन भी दो आरजू और दो इन्तजार मे कट जाते है । इससे आगे बढें तो इंसान की सिर्फ दो दिन की कुल जिंदगी है और उन दो दिनों में एक दिन मौत का होता है, अब बचा केवल एक दिन । और पता नहीं इस एक दिन की जिंदगी पर आदमी इतना क्यों अकडता हैं ? जिंदगी की हैसियत एक मुट्ठी राख से ज्यादा कुछ भी नहीं है ।
जिंदगी में केवल चार दिन है और वे चार दिन भी दो आरजू और दो इन्तजार मे कट जाते है । इससे आगे बढें तो इंसान की सिर्फ दो दिन की कुल जिंदगी है और उन दो दिनों में एक दिन मौत का होता है, अब बचा केवल एक दिन । और पता नहीं इस एक दिन की जिंदगी पर आदमी इतना क्यों अकडता हैं ? जिंदगी की हैसियत एक मुट्ठी राख से ज्यादा कुछ भी नहीं है ।
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