किराये की कोख या अंग्रेजी में सरोगेसी क्रिया में बांझ महिला का अंडाणु लेने के बाद उसके ही पति के शुक्राणु से आई.वी.एफ. विधि द्वारा फर्टिलाइजेशन करते हैं। इसके बाद तैयार भ्रूण को एक दूसरी स्वस्थ गर्भाशय वाली महिला की बच्चेदानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। ऐसी महिला को किराए की कोख वाली मां या सरोगेट मदर कहते है। सरोगेट मदर के गर्भ में पलने वाला बच्चा अनुवांशिक दृष्टि से (जेनेटिकली) अपने मां-बाप का ही होता है, केवल उसे जन्म देने वाली महिला दूसरी होती है।
कब जरूरत है
द्य सरोगेसी की प्रक्रिया ऐसी महिलाओं के लिये उपयोगी है, जिनकी बच्चेदानी में टी.बी. का संक्रमण काफी तीव्र हो।
द्य जिस महिला का किन्हीं कारणों से बार-बार गर्भपात होता है या बच्चेदानी में कोई पैदाइशी कमी होती है।
द्य बार-बार असफल टेस्ट-ट्यूब बेबी क्रिया या किसी बीमारी की वजह से ऑपरेशन कर बच्चेदानी निकाली जा चुकी हो।
द्य जिन महिलाओं में अंडाणुओं के प्रजनन की शक्ति खत्म हो चुकी है, वे सरोगेट महिला से अंडाणु डोनेट कराने के बाद अपने ही पति के शुक्राणु द्वारा सरोगेसी विधि से मां बन सकती हैं।
इन बातों पर दें ध्यान
सरोगेट मदर बांझ महिला की रिश्तेदार भी हो सकती है या फिर वह दंपति की जानकार या अजनबी भी हो सकती है। अगर पति को शुक्राणु नहीं बनता है, तो इस क्रिया में डोनर से शुक्राणु लेते हुए सरोगेसी क्रिया करते है। ऐसी स्थिति में खर्चा कम आता है।
ऐसी हो सरोगेट मदर
द्य सरोगेट महिला की उम्र 22 से 40 वर्ष के मध्य होनी चाहिए। उसका स्वास्थ्य अच्छा हो और वह किसी नशीले पदार्थ का सेवन न करती हो।
द्य सरोगेट क्रिया से पहले कुछ कानूनी बातें भी ध्यान देने योग्य होती है। जैसे डोनर और दंपति की पहचान को आपस में गोपनीय रखा जाता है।
द्य अगर अंडाणु देने वाली स्त्री सरोगेट मदर बनती है, तो इस स्थिति में पहचान को गुप्त नहीं रखा जाता है।
द्य डॉक्टर द्वारा संबंधित दंपति को सारे खर्चो की जानकारी देनी चाहिए।
द्य सरोगेट मदर व दंपति दोनों को सरोगेसी क्रिया से संबंधित नियमों व कानूनों को समझते हुए दोनों पक्षों से एक कानूनी पेपर साइन कराना चाहिए।
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