अनोखा व्यवसाय Unique business
सभी के सपने ? प्रतिदिन १-२ घंटे----२-५ वर्ष में ५०,००० -५ लाख प्रतिमाह पैसे
१. अति सुन्दर घर कामा सकते है जो sharp , Ambitious लोग है जो ११ सपने का
२ बच्चो की अच्छी पढ़ाई ( अग्रेजी स्कूल में ) बात कर रहू ?आपने JOB/T/B करते हुवे इस कार्य करे
३ अपनी माता - पिता का सेवा करना ? ----------------------------------------------------------------------
४ परिवार के लिए समय
५ परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा Job पैसा + समय + आर्थिक सुरक्षा + अपनी पहचान
६ बच्चो की शादी शानदार ____________________________________________
७ वेदेशी कार T / B
८ पत्नी के जन्म दिन में हीरे -मोती -सोना उपहार ___________________________________________
९ हर साल वेदेशी यात्रा हर साल
१० अपने समाज में दान -पुन्य करना जिन भाइयो के पास ये चारो है उसके पास सब विश्य सब है
११ असहाय , नेत्रहीन की मदद करना हमारे अनोखा व्यवसाय में ये सब कुछ है Friendsबिज के दलाल
हमको खरीदने की आदत को बदलनी होगी यो कैसे हम जो सामान बाजार से खरीदते है उसे बंद करना होगा ? वो क्यों भाई
M / C - T.V.- CNDF-W- R
अगर एक पेन का मूल्य १० / है फैट्री में उसका मूल्य सिर्फ ४ होता है ६ रुपये बिज के दलाल लेलेते है आपका एक माह का राशन ५,०००/
३,०००/ रुपए बिच के दलाल ले रहे है आपका एक माह का राशन सिर्फ २,०००/ है अब हमको अपनी दुकान से सामान लेना है इस्तेमाल करना है FRIENDS F - FRIENDS R -RELATIVES I-INSTITUTE -E -engineers - N -neighbor पगोसी D-doctors-S-strangers
अनोखा व्यवसाय के लिये ९९५ का (१). १५-२० % (२) मनी बेक गर. (३) होम डिलवरी (४) ९० दिनी तक अनोखा व्यवसाय ९९५ वापस
९० देशो में है , 1998 में भारत में ,1959 अमरीका ५० साल पुराना कपनी है
होम केयर , पार्सल केयर , स्किन केयर , health केयर ,कृषि , बीमा है
R.I -4% २०० साल तक , पुची नहीं लगता है , भारत सरकार टैक्स सबसे जयादा देता है , १२५ से जयादा प्रोड० ,
Saturday, 15 October 2011
Friday, 1 July 2011
Friday, 24 June 2011
Dev-Dilse: कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा हैतेरी यादों को...
Dev-Dilse: कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा है
तेरी यादों को...: "कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा है तेरी यादों को कलेजे से लगा रक्खा है लब पे आहें भी नहीं आँख में आँसू भी नहीं दिल ने हर राज़ मुहब्बत का ..."
तेरी यादों को...: "कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा है तेरी यादों को कलेजे से लगा रक्खा है लब पे आहें भी नहीं आँख में आँसू भी नहीं दिल ने हर राज़ मुहब्बत का ..."
रंग-बिरंगे बाल, सेहत का बुरा हाल
परमानेंट हेयर कलर करवाने वालों को बाद में त्वचा संबंधी दिक्कतों सामना करना पड़ता है। इसलिए यदि हेयर कलर करवाना भी हो तो परमानेंट के बजाय टेम्परेरी कलर करवाएं तो बेहतर है। परमानेंट हेयर कलर में अधिक मात्रा में अमोनिया होता है। जो बालों को सफेद करने के अलावा उनकी कोमलता खत्म कर देता है। इसके इस्तेमाल से कम उम्र में ही युवाओं के बाल अधिक झड़ने का खतरा हो जाता है। इसलिए जहाँ तक हो सके तो परमानेंट हेयर कलर के इस्तेमाल से बचना चाहिए ताकि शौक के चक्कर में सर के बाल न गंवाने पड़ें। हेयर कलर से होते हैं यह नुकसान : बालों का झड़ना, बालों का सफेद होना, सांस लेने में दिक्कत, गले में कफ जमना, सर्दी-जुकाम, त्वचा में जलन, एलर्जी, आंखें लाल होना, खुजली।
मीठा खाएं, डिप्रेशन भगाएं
चीनी का प्रयोग अवसाद को दूर करने में किया जाता है। शरीर के शुगर लेवल को ठीक कर नई ऊर्जा देता है। जब भी आप लो फील करें, चीनी से बने पदार्थों का सेवन करें। जूस का एक ग्लास, एक टुकड़ा केक या फिर एक दो चम्मच डेसर्ट को खाकर आप पहले जैसे तरोताजा महसूस कर सकते हैं। जैम और टोस्ट : कार्बोहाइड्रेट का सेवन अवसाद के मरीजों के लिए लाभकारी होता है। इसलिए ब्रेड में पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट पर जैम लगाकर खाने से अच्छा महसूस करते हैं। ब्रेड की जगह आप मफिंस, ओट मिल्क भी ले सकते हैं। अंडे : संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे इस विज्ञापन में कही गई बात सौ फीसदी सही है। अंडे में पाए जाने वाला डीएचए 50 फीसदी अवसाद को ठीक कर सकता है। साथ ही शरीर को निरोगी रखता है। पालक : पालक में विटामीन-बी के साथ आयरन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। इसलिए लो फील करने पर कम से कम दो कप पालक का सूप पीने से इससे आप उबर सकते हैं। आयरन युक्त भोजन करें : आयरन युक्त भोजन से शरीर में ऊर्जा की प्राप्ति होती है। आयरन की सबसे अधिक कमी महिलाओं में होती है इसलिए अकसर वे अवसाद की शिकार हो जाती हैं। इससे बचने के लिए आयरनयुक्त भोजन करना चाहिए।
शाकाहार में है ज्यादा शक्ति
संतुलित शाकाहारी भोजन शरीर को सभी पोषक तत्व प्रदान करता है। यही नहीं,वह हृदय रोग, कैंसर,उच्च रक्तचाप,मधुमेह,जोड़ों का दर्द व अन्य कई बीमारियों से हमें बचाता भी है। उन लोगों में हाई ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया जो मांस से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते थे। शाकाहारी प्रोटीन में एमीनो एसिड पाया जाता है। यह शरीर में जाकर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। सब्जियों में एमीनो एसिड के साथ-साथ मैग्नेशियम भी पाया जाता है। यह हमारे रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। अधिक मांसाहार करने वाले लोगों में फाइबर की भी कमी पाई गई है। फाइबर हमें अनाज से मिलता है। दाल,फलों का रस और सलाद से कई पोषक तत्व मिलते हैं। ये हमारे शरीर के वजन को भी संतुलित रखते हैं। ज्यादा मांसाहार मोटापा भी बढ़ा देता है। मांस में वसा की मात्रा बहुत होती है। हमारे शरीर को सबसे ज्यादा जरूरत होती है कार्बोहाड्रेट की। अगर आप सोचते हैं कि यह मांस में मिलेगा तो आप गलत हैं,क्योंकि मांस में कार्बोहाइड्रेट बिलकुल नहीं होता। यह ब्रेड,रोटी,केले और आलू वगैरह में पाया जाता है।
टमाटर खाएं, सेहत की लाली पाएं
टमाटर शरीर से विशेषकर गुर्दे से रोग के जीवाणुओं को निकालता है। इसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन-सी पाए जाते हैं। एसिडिटी की शिकायत होने पर टमाटरों की खुराक बढ़ाने से यह शिकायत दूर हो जाती है। हालांकि टमाटर का स्वाद खट्टा-सा होता है, लेकिन यह शरीर में खारी प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है।इसके खट्टे स्वाद का कारण यह है कि इसमें साइट्रिक एसिड और मैलिक एसिड पाए जाते हैं। अपने खट्टेपन की वजह से ही यह एंटासिड के रूप में काम करता है। मधुमेह के रोगियों के लिए भी टमाटर बहुत उपयोगी होता है। यह पेशाब में चीनी के प्रतिशत पर नियंत्रण पाने के लिए प्रभावशाली होता है। साथ ही कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होने के कारण इसे एक उत्तम भोजन माना जाता है।टमाटर में विटामिन 'ए' काफी मात्रा में पाया जाता है, यह आंखों के लिए बहुत लाभकारी है। टमाटर से पाचन शक्ति बढ़ती है। इसके लगातार सेवन से जिगर बेहतर ढंग से काम करता है और गैस की शिकायत भी दूर होती है। जो लोग अपना वजन कम करने के इच्छुक हैं, उनके लिए टमाटर एक वरदान है। एक मध्यम आकार के टमाटर में केवल 12 कैलोरीज होती है।
मजाक नहीं समझते शराब के नशेड़ी
मिसाल के तौर पर देखा गया है कि शराब के नशेड़ी चुटकुले नहीं समझ पाते हैं. जर्मन न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट जेनिफर उएकरमान्न व ब्रिटिश वैज्ञानिकों के एक शोध से पता चला है कि चुटकुलों पर मस्तिष्क के जिस हिस्से में प्रतिक्रिया होती है, शराब के नशेड़ियों में वह हिस्सा कुंद हो जाता है. जेनिफर उएकरमान्न बताती हैं कि इस अध्ययन में उनका काम था इंटरनेट से चुटकुलों को छांटना. इसकी खातिर उन्होंने लगभग 20 हजार चुटकुले पढ़े. उनको चुनने के मामले में कुछ एक बातों पर ध्यान देना पड़ा. मिसाल के तौर पर यह कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई चुटकुला न हो.
अंततः 24 चुटकुले छांटे गए, जिनके जरिये पता लगाना था कि चुटकुलों में छिपे सामाजिक मुद्दों पर नशेड़ियों की क्या प्रतिक्रिया होती है.
अंततः 24 चुटकुले छांटे गए, जिनके जरिये पता लगाना था कि चुटकुलों में छिपे सामाजिक मुद्दों पर नशेड़ियों की क्या प्रतिक्रिया होती है.
Tuesday, 19 April 2011
Wednesday, 6 April 2011
Thursday, 31 March 2011
Monday, 28 March 2011
Thursday, 24 March 2011
All facts about hindi song download.: French model in anti-anorexia campaign dies
All facts about hindi song download.: French model in anti-anorexia campaign dies: "PARIS Isabelle Caro, a French actress and model whose emaciated image in a shock Italian ad campaign helped rivet global attention on the..."
Sunday, 20 March 2011
ALL INDIA ISLAHE ANJUMAN SIDDIQUI (R)
ALL INDIA ISLAHE ANJUMAN SIDDIQUI (R), इस संस्था से दिल के मरीजो का इलाज फ्री करवाया जाता है संपर्क करे -जैनुल हसन फिरदौसी ,अंबिकापुर मोबाइल ९४२५२५३१००
Mobile 9425253100 / 9826867584
07774-223608
Mobile 9425253100 / 9826867584
07774-223608
Tuesday, 15 March 2011
Tuesday, 8 March 2011
बीमारियों से जंग हारता भारत
एक ओर जहां भारत दुनिया की उभरती शक्ति होने का दावा कर रहा है वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा पोलियो, मलेरिया और क्षयरोग से ग्रसित है.
दुनिया के कई प्रगतिशील देशों ने भी इन बीमारियों पर लगभग क़ाबू पा लिया है.
ताज़ा आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर के पोलियो के 42 फ़ीसदी, क्षयरोग के 23 फ़ीसदी, कुष्ठरोग के 54 प्रतिशत, काली खांसी के 86 फ़ीसदी और मलेरिया के 55 प्रतिशत पीड़ित भारत में बसते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ भारत में कुपोषित शिशुओं की तादाद पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है.
जानकारों का मानना है कि इन आंकड़ों पर नज़र दौड़ाते वक्त ये भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं जैसे पीने के साफ पानी और स्वच्छता की भी कमी है.
ग़रीबी और कुपोषण पर एक अध्ययन में अरविंद विरमानी का कहना है कि आयु मे बढ़ोतरी और मृत्यु-दर में कमी अलग-अलग बीमारियों पर क़ाबू पाने के नतीजे में नहीं बल्कि पीने के साफ़ पानी और स्वच्छता पर निर्भर करती है.
बुनियादी सुविधाएं
लेकिन यूनिसेफ़ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े इस संबंध में बहुत अच्छी तस्वीर नहीं पेश करते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र के सिर्फ 21 प्रतिशत जनसंख्या को 'उन्नत' स्वच्छता सेवाएं उपलब्ध हैं जबकि 69 फ़ीसदी लोग शौच के लिए खुली जगह में जाते हैं.
हालांकि पीने के साफ़ पानी मुहैया करवा पाने के मामले में हालात पहले से बहुत बेहतर हुए हैं.
भारत ने इस क्षेत्र में सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, ग्रामीण जल आपूर्ति योजना और पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की है.
लेकिन कई राज्य इन योजनाओं के लिए दिए गए धन को पूरी तरह ख़र्च नहीं कर पा रहे हैं.
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत छत्तीसगढ़ में उत्साहर्वधक काम हुआ है लेकिन उड़ीसा में ये बहुत सफल नहीं रहा है.
दुनिया के कई प्रगतिशील देशों ने भी इन बीमारियों पर लगभग क़ाबू पा लिया है.
ताज़ा आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर के पोलियो के 42 फ़ीसदी, क्षयरोग के 23 फ़ीसदी, कुष्ठरोग के 54 प्रतिशत, काली खांसी के 86 फ़ीसदी और मलेरिया के 55 प्रतिशत पीड़ित भारत में बसते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ भारत में कुपोषित शिशुओं की तादाद पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है.
जानकारों का मानना है कि इन आंकड़ों पर नज़र दौड़ाते वक्त ये भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं जैसे पीने के साफ पानी और स्वच्छता की भी कमी है.
ग़रीबी और कुपोषण पर एक अध्ययन में अरविंद विरमानी का कहना है कि आयु मे बढ़ोतरी और मृत्यु-दर में कमी अलग-अलग बीमारियों पर क़ाबू पाने के नतीजे में नहीं बल्कि पीने के साफ़ पानी और स्वच्छता पर निर्भर करती है.
बुनियादी सुविधाएं
लेकिन यूनिसेफ़ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े इस संबंध में बहुत अच्छी तस्वीर नहीं पेश करते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र के सिर्फ 21 प्रतिशत जनसंख्या को 'उन्नत' स्वच्छता सेवाएं उपलब्ध हैं जबकि 69 फ़ीसदी लोग शौच के लिए खुली जगह में जाते हैं.
हालांकि पीने के साफ़ पानी मुहैया करवा पाने के मामले में हालात पहले से बहुत बेहतर हुए हैं.
भारत ने इस क्षेत्र में सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, ग्रामीण जल आपूर्ति योजना और पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की है.
लेकिन कई राज्य इन योजनाओं के लिए दिए गए धन को पूरी तरह ख़र्च नहीं कर पा रहे हैं.
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत छत्तीसगढ़ में उत्साहर्वधक काम हुआ है लेकिन उड़ीसा में ये बहुत सफल नहीं रहा है.
Wednesday, 23 February 2011
स्वास्थ्य कर्मचारी दवारा नियमित नौकरी की मांग
संविदा आधार पर नियुक्ति पाए स्वास्थ्य कर्मचारी अब नियमित नियुक्ति की मांग को लेकर आंदोलन की राह पर है।
स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के बैनर तले आंदोलन कर रहे इन कर्मचारीयों में लैब टेक्निशियंस और स्टाफ नर्स शामिल है।
प्रदेश भर में संविदा आधार पर नौकरी करने वाले कर्मचारी अब आर पार के मुड में नजर आ रहे है। चुनावी साल को देखते हुए कर्मचारी संघ ने दबाव बढा दिया है।
उल्लेखनीय है कि, प्रदेश के स्वास्थ्य अमले में संविदा आधार पर काम करने वाले कर्मचारीयों की संख्या कुछ इस तरह है कि, यदि वे हट जाएं तो पूरी व्यवस्था ही चरमरा जाएगी।
संविदा आधार पर बरसों से नौकरी कर रहे कर्मचारीयों को उम्मीद थी कि, जल्द ही उन्हे नियमित कर दिया जाएगा लेकिन नियमितीकरण नहीं हुआ।
सन 2001 से संविदा आधार पर लैब टेक्नीशियसऔर आंदोलन में शामिल जैनुल हसन फिरदौसीसरकार की संविदा नीति पर सवाल उठाते हुए पूछते है आज नहीं तो कल नियमित होंगे की उम्मीद ने उन जैसे कईयों की उमर ही पार करा दी और अब भी यह तय नही है कि भविष्य क्या होगा ।
हर जिले में धरना प्रदर्शन का सिलसिला खत्म होने के बाद ये कर्मचारी आंदोलन को और उग्र करेंगे।संविदा आधार पर नौकरी करने वाले ये कर्मचारी यदि काम बंद करेगे तो स्वास्थ्य विभाग जो पहले ही बदहाल है वहा चुनावी साल मे और कबाडा होगा जाहिर है सरकार ऐसा कुछ नहीं चाहेगी जो सरकार की गलत इमेज बनाए ये बात संविदा कर्मचारी भी जानते है इसलिए दबाव बनाने में वे कोई कसर नहीं छोडने वाले।
स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के बैनर तले आंदोलन कर रहे इन कर्मचारीयों में लैब टेक्निशियंस और स्टाफ नर्स शामिल है।
प्रदेश भर में संविदा आधार पर नौकरी करने वाले कर्मचारी अब आर पार के मुड में नजर आ रहे है। चुनावी साल को देखते हुए कर्मचारी संघ ने दबाव बढा दिया है।
उल्लेखनीय है कि, प्रदेश के स्वास्थ्य अमले में संविदा आधार पर काम करने वाले कर्मचारीयों की संख्या कुछ इस तरह है कि, यदि वे हट जाएं तो पूरी व्यवस्था ही चरमरा जाएगी।
संविदा आधार पर बरसों से नौकरी कर रहे कर्मचारीयों को उम्मीद थी कि, जल्द ही उन्हे नियमित कर दिया जाएगा लेकिन नियमितीकरण नहीं हुआ।
सन 2001 से संविदा आधार पर लैब टेक्नीशियसऔर आंदोलन में शामिल जैनुल हसन फिरदौसीसरकार की संविदा नीति पर सवाल उठाते हुए पूछते है आज नहीं तो कल नियमित होंगे की उम्मीद ने उन जैसे कईयों की उमर ही पार करा दी और अब भी यह तय नही है कि भविष्य क्या होगा ।
हर जिले में धरना प्रदर्शन का सिलसिला खत्म होने के बाद ये कर्मचारी आंदोलन को और उग्र करेंगे।संविदा आधार पर नौकरी करने वाले ये कर्मचारी यदि काम बंद करेगे तो स्वास्थ्य विभाग जो पहले ही बदहाल है वहा चुनावी साल मे और कबाडा होगा जाहिर है सरकार ऐसा कुछ नहीं चाहेगी जो सरकार की गलत इमेज बनाए ये बात संविदा कर्मचारी भी जानते है इसलिए दबाव बनाने में वे कोई कसर नहीं छोडने वाले।
daily surguja: भारत की मिटटी का गर्व हैं बेटियाँ घर परिवार को बनत...
daily surguja: भारत की मिटटी का गर्व हैं बेटियाँ घर परिवार को बनत...: "हमारे देश में जब कोई बेटा जनम लेता है तो सब खुश होते है, पर जब किसी बेटी का जनम होते है मातम सा छा जाता है.कई जगह तो लड़के को स्कूल भेजा जा..."
भारत की मिटटी का गर्व हैं बेटियाँ घर परिवार को बनती स्वर्ग हैं
हमारे देश में जब कोई बेटा जनम लेता है तो सब खुश होते है, पर जब किसी बेटी का जनम होते है मातम सा छा जाता है.कई जगह तो लड़के को स्कूल भेजा जाता है लेकिन लड़की को नहीं भेजा जाता क्योंकि वे सोचते है की इन्हें पढ़ा कर क्या फ़ायदा? इन्हें तो चूल्हा ही फूकना है.पर वे लोग यह नहीं जानते की लडकिय अब किसी काम में लड़कों से पीछे नहीं है.
कई जगह तो बेटी के जनम लेते ही इन्हें मार देते है. उन्हें मारने के कारण अब हमारे देश में लड़की की संख्या कम हो गयी है. कई राज्य में लड़की की संख्या कम होने की वजह से शादी नहीं हो पा रही है,दुसरे राज्य की लड़कियों से शादी करना पद रहा है. किसी राज्य में तो लड़के की संख्या १००० है तो लड़कियों की संख्या ७३३ है. इसी कारण एक राज्य के लड़कों को दुसरे राज्य की लडकियों से शादी करना पडरहा है.
ये दहेज़ की वजह से लड़कियों को मारते हैं . वे सोचते है की लड़के उन्हें कम के खिलाएंगे पर वे लोग ये नहीं जानते की माँ बाप का दुःख जितना लड़कियों समझ पाती है उतना लड़के नहीं. मेरी आप लोगों से गुजारिश है की आप लोग ऐसा मत कीजिये
कई जगह तो बेटी के जनम लेते ही इन्हें मार देते है. उन्हें मारने के कारण अब हमारे देश में लड़की की संख्या कम हो गयी है. कई राज्य में लड़की की संख्या कम होने की वजह से शादी नहीं हो पा रही है,दुसरे राज्य की लड़कियों से शादी करना पद रहा है. किसी राज्य में तो लड़के की संख्या १००० है तो लड़कियों की संख्या ७३३ है. इसी कारण एक राज्य के लड़कों को दुसरे राज्य की लडकियों से शादी करना पडरहा है.
ये दहेज़ की वजह से लड़कियों को मारते हैं . वे सोचते है की लड़के उन्हें कम के खिलाएंगे पर वे लोग ये नहीं जानते की माँ बाप का दुःख जितना लड़कियों समझ पाती है उतना लड़के नहीं. मेरी आप लोगों से गुजारिश है की आप लोग ऐसा मत कीजिये
Tuesday, 1 February 2011
Friday, 24 December 2010
Saturday, 11 December 2010
Friday, 10 December 2010
Sunday, 5 December 2010
Thursday, 2 December 2010
Wednesday, 1 December 2010
Tuesday, 30 November 2010
Monday, 29 November 2010
Thursday, 25 November 2010
Wednesday, 24 November 2010
Monday, 22 November 2010
Tuesday, 9 November 2010
Monday, 8 November 2010
Monday, 18 October 2010
Saturday, 25 September 2010
Wednesday, 22 September 2010
किराये की कोख
किराये की कोख या अंग्रेजी में सरोगेसी क्रिया में बांझ महिला का अंडाणु लेने के बाद उसके ही पति के शुक्राणु से आई.वी.एफ. विधि द्वारा फर्टिलाइजेशन करते हैं। इसके बाद तैयार भ्रूण को एक दूसरी स्वस्थ गर्भाशय वाली महिला की बच्चेदानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। ऐसी महिला को किराए की कोख वाली मां या सरोगेट मदर कहते है। सरोगेट मदर के गर्भ में पलने वाला बच्चा अनुवांशिक दृष्टि से (जेनेटिकली) अपने मां-बाप का ही होता है, केवल उसे जन्म देने वाली महिला दूसरी होती है।
कब जरूरत है
द्य सरोगेसी की प्रक्रिया ऐसी महिलाओं के लिये उपयोगी है, जिनकी बच्चेदानी में टी.बी. का संक्रमण काफी तीव्र हो।
द्य जिस महिला का किन्हीं कारणों से बार-बार गर्भपात होता है या बच्चेदानी में कोई पैदाइशी कमी होती है।
द्य बार-बार असफल टेस्ट-ट्यूब बेबी क्रिया या किसी बीमारी की वजह से ऑपरेशन कर बच्चेदानी निकाली जा चुकी हो।
द्य जिन महिलाओं में अंडाणुओं के प्रजनन की शक्ति खत्म हो चुकी है, वे सरोगेट महिला से अंडाणु डोनेट कराने के बाद अपने ही पति के शुक्राणु द्वारा सरोगेसी विधि से मां बन सकती हैं।
इन बातों पर दें ध्यान
सरोगेट मदर बांझ महिला की रिश्तेदार भी हो सकती है या फिर वह दंपति की जानकार या अजनबी भी हो सकती है। अगर पति को शुक्राणु नहीं बनता है, तो इस क्रिया में डोनर से शुक्राणु लेते हुए सरोगेसी क्रिया करते है। ऐसी स्थिति में खर्चा कम आता है।
ऐसी हो सरोगेट मदर
द्य सरोगेट महिला की उम्र 22 से 40 वर्ष के मध्य होनी चाहिए। उसका स्वास्थ्य अच्छा हो और वह किसी नशीले पदार्थ का सेवन न करती हो।
द्य सरोगेट क्रिया से पहले कुछ कानूनी बातें भी ध्यान देने योग्य होती है। जैसे डोनर और दंपति की पहचान को आपस में गोपनीय रखा जाता है।
द्य अगर अंडाणु देने वाली स्त्री सरोगेट मदर बनती है, तो इस स्थिति में पहचान को गुप्त नहीं रखा जाता है।
द्य डॉक्टर द्वारा संबंधित दंपति को सारे खर्चो की जानकारी देनी चाहिए।
द्य सरोगेट मदर व दंपति दोनों को सरोगेसी क्रिया से संबंधित नियमों व कानूनों को समझते हुए दोनों पक्षों से एक कानूनी पेपर साइन कराना चाहिए।
कब जरूरत है
द्य सरोगेसी की प्रक्रिया ऐसी महिलाओं के लिये उपयोगी है, जिनकी बच्चेदानी में टी.बी. का संक्रमण काफी तीव्र हो।
द्य जिस महिला का किन्हीं कारणों से बार-बार गर्भपात होता है या बच्चेदानी में कोई पैदाइशी कमी होती है।
द्य बार-बार असफल टेस्ट-ट्यूब बेबी क्रिया या किसी बीमारी की वजह से ऑपरेशन कर बच्चेदानी निकाली जा चुकी हो।
द्य जिन महिलाओं में अंडाणुओं के प्रजनन की शक्ति खत्म हो चुकी है, वे सरोगेट महिला से अंडाणु डोनेट कराने के बाद अपने ही पति के शुक्राणु द्वारा सरोगेसी विधि से मां बन सकती हैं।
इन बातों पर दें ध्यान
सरोगेट मदर बांझ महिला की रिश्तेदार भी हो सकती है या फिर वह दंपति की जानकार या अजनबी भी हो सकती है। अगर पति को शुक्राणु नहीं बनता है, तो इस क्रिया में डोनर से शुक्राणु लेते हुए सरोगेसी क्रिया करते है। ऐसी स्थिति में खर्चा कम आता है।
ऐसी हो सरोगेट मदर
द्य सरोगेट महिला की उम्र 22 से 40 वर्ष के मध्य होनी चाहिए। उसका स्वास्थ्य अच्छा हो और वह किसी नशीले पदार्थ का सेवन न करती हो।
द्य सरोगेट क्रिया से पहले कुछ कानूनी बातें भी ध्यान देने योग्य होती है। जैसे डोनर और दंपति की पहचान को आपस में गोपनीय रखा जाता है।
द्य अगर अंडाणु देने वाली स्त्री सरोगेट मदर बनती है, तो इस स्थिति में पहचान को गुप्त नहीं रखा जाता है।
द्य डॉक्टर द्वारा संबंधित दंपति को सारे खर्चो की जानकारी देनी चाहिए।
द्य सरोगेट मदर व दंपति दोनों को सरोगेसी क्रिया से संबंधित नियमों व कानूनों को समझते हुए दोनों पक्षों से एक कानूनी पेपर साइन कराना चाहिए।
सरोगेट मदर्स क्या सचमुच एक 'अवन' की तरह हैं??
एक विषय कुछ ऐसा है, जिसपर मैं अपना मत नहीं बना पायी हूँ, कि यह सही है या नहीं और इसे बढ़ावा देना चाहिए या नहीं .और वो है सरोगेट मदर्स का. भारत, दुनिया भर के माता-पिताओं के चेहरे पर मुस्कान लाने में सक्षम हुआ है.दुनिया भर से लोग यहाँ आते हैं.पैसे के बल पर एक कोख किराए पर लेते हैं और गुलगोथाने से बच्चे को गोद में लिए वापस अपने देश चले जाते हैं.
भारत के लिए बच्चे के जन्म लेने की ये प्रक्रिया कोई नई नहीं है. प्राचीन धर्मग्रंथों में भी इसका जिक्र है. और Gestational surrogacy का सबसे अच्छा उदहारण है भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म. राजा कंस के डर से देवकी के गर्भ से उनका प्रतिरोपण रोहिणी देवी के गर्भ में कर दिया गया. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो sperm donor हुए वासुदेव,egg donor देवकी और उन्हें जन्म दिया रोहिणी देवी ने. बाइबल में भी इसका जिक्र है और चैप्टर १६ में अब्राहम और सारा का उल्लेख है कि 'सारा' बंध्या थीं और उन्होंने अपनी दासी 'हैगर' से आग्रह किया था कि वो उनके और अब्राहम के बच्चे को जन्म दे.
Surrogacy दो तरह की होती है Traditional surrogacy और Gestational surrogacy .Traditional surrogacy में sperm पिता के ही होते हैं पर egg किसी दूसरी महिला का और इसे ट्यूब में fertilize कर और इसे जन्म देने वाली माँ के गर्भ में प्रतिरोपित कर दिया जाता है. Gestational surrogacy में पिता के sperm और माँ के egg को fertilize कर किसी अन्य महिला (सरोगेट मदर) के गर्भ में प्रतिरोपित कर दिया जाता है.
आधुनिक युग में अमेरिका में १९७८ में IVF पद्धति से पहले टेस्ट ट्यूब बेबी लुइ ब्राउन का जन्म हुआ और कुछ ही महीनो बाद ३ अक्टूबर १९७८ को कलकत्ता में भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ,जिसका नाम रखा गया 'दुर्गा' .पर जिस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों में स्थान बनाया वह थी.२००४ में ,गुजरात के 'आनंद' नमक एक छोटे से शहर की एक महिला का लन्दन में रहने वाली अपनी बेटी के बच्चे को जन्म देना.
डॉक्टर का कहना है, हर वर्ष विश्व भर में करीब ५०० बच्चे ,सरोगेसी की प्रक्रिया से जन्म लेते हैं.उनमे करीब २०० बच्चे भारत में जन्म लेते हैं.जाहिर है,भारत की गरीबी और इसी सहारे अपना जीवन सुधारने की आकांक्षा लोगों को इसके लिए प्रेरित करती है. हर IVF क्लिनिक एक सरोगेसी एजेंसी से जुड़ी होती है. इसके एजेंट ,झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाली गरीब महिलाओं से संपर्क करते हैं और अपने जीवन स्तर सुधारने ,अपने बच्चों का भविष्य बनाने का एक अवसर मिलता देख,ये लोग एक अच्छी रकम ले बच्चे को जन्म देने को तैयार हो जाती हैं. क्लिनिक वाले इन महिलाओं का पूरा ख्याल रखते हैं पर पति की रजामंदी जरूरी होती है.उन्हें भी बुलाकर काउंसिलिंग की जाती है. फिर भी उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों की नाराजगी और पड़ोसियों की तानाकशी तो सुननी ही पड़ती है. लेकिन जब वे उन्हें एक साल के बाद अपनी झोपड़ी छोड़, अपने फ़्लैट में शिफ्ट होते और जीवन स्तर में सुधार देखते हैं तो कई अन्य महिलायें भी यह राह अपना लेती हैं.
भारत की तरफ आकृष्ट होने की कुछ वजहें और हैं. इस प्रक्रिया का कम खर्चीला होना. यहाँ एक बच्चे के जन्म में १० लाख से २५ लाख तक का खर्च आता है जबकि अमेरिका में यही खर्च बढ़कर ५५ लाख का हो जाता है. वैसे जन्म देने वाली माँ के हिस्से २,३ लाख रुपये ही आते हैं. ५०,००० एजेंट ले लेते हैं और बाकी पैसे प्रतिरोपण,दवाइयां और माँ की देखभाल में खर्च होते हैं.भारत में कानून भी उनके पक्ष में है वह सरोगेट माँ को नहीं बल्कि donors को ही बच्चे का कानूनी संरक्षक मानता है. इंगलैंड और ऑस्ट्रेलिया में जन्म देने वाली माँ को ही यह अधिकार प्राप्त है.फिर भारत में लोग बच्चे को सौंपने से इनकार नहीं करते.जबकि कई बार विदेशों में माँ ने बाद में इनकार कर दिया है,बच्चे को सौंपने से.
शिकागो के बेनहूर सैमसन ने २००६ में सरोगेसी कंसल्टेंसी शुरू की ,वे अमेरिका,इंग्लैण्ड ,कनाडा से इच्छुक दंपत्ति को भारत लाते हैं.उनका कहना है ४ साल में उनका बिजनेस ४०० गुणा बढ़ गया है.
यहाँ, बिलकुल गहरे श्याम वर्ण की लडकियां, विदेशी नाक नक्श के सफ़ेद गुलाबी बच्चों को जन्म देती हैं. डॉक्टर यशोधरा म्हात्रे का कहना है, 'गर्भ एक अवन की तरह है ,इसमें काला चॉकलेट केक बेक करना है या सफ़ेद वनिला केक यह आपकी मर्ज़ी पर है". पर यह सुन.मन थोड़ा सशंकित हो जाता है. बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया क्या इतनी मेकैनिकल हो सकती है.? अजन्मे बच्चे से भी माँ का एक जुड़ाव होता है.पर यहाँ अगर भावनाएं जुड़ी रहेंगी तो फिर माँ बच्चे से अलग कैसे हो पायेगी?
एक विचार यह भी सर उठाता है कि अपने बच्चे के इच्छुक माता-पिता के लिए इस से बड़े पुण्य का काम और क्या हो सकता है कि आप उनका ही अंश उनके गोद में सौंप सकें. चाहे हम एडॉप्शन की कितनी भी वकालत करें.पर इस से इनकार नहीं कर सकते कि हर स्त्री-पुरुष में अपने बच्चे को गोद में खिलाने की आकांक्षा होती है. कितने ही निःसंतान दंपत्ति की ज़द्दोज़हद देखी है.बरसों इलाज. स्त्रियों का अनेकों शारीरिक कष्ट से गुजरना और अगर विज्ञान उन्हें यह सुविधा मुहैया करवा रहा है. और इसी बहाने वह किसी के जीवन में सुधार लाने में भी सक्षम होते हैं तो क्या गलत है इसमें? पर भविष्य की एक भयावह तस्वीर भी खींच जाती है कि यह चलन आम ना हो जाए.और कहीं इसका दुरुपयोग ना शुरू हो जाए.आज मजबूरी में वे यह प्रक्रिया अपना रहें हैं,भविष्य में यह शौक ना बन जाए.
भारत के लिए बच्चे के जन्म लेने की ये प्रक्रिया कोई नई नहीं है. प्राचीन धर्मग्रंथों में भी इसका जिक्र है. और Gestational surrogacy का सबसे अच्छा उदहारण है भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म. राजा कंस के डर से देवकी के गर्भ से उनका प्रतिरोपण रोहिणी देवी के गर्भ में कर दिया गया. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो sperm donor हुए वासुदेव,egg donor देवकी और उन्हें जन्म दिया रोहिणी देवी ने. बाइबल में भी इसका जिक्र है और चैप्टर १६ में अब्राहम और सारा का उल्लेख है कि 'सारा' बंध्या थीं और उन्होंने अपनी दासी 'हैगर' से आग्रह किया था कि वो उनके और अब्राहम के बच्चे को जन्म दे.
Surrogacy दो तरह की होती है Traditional surrogacy और Gestational surrogacy .Traditional surrogacy में sperm पिता के ही होते हैं पर egg किसी दूसरी महिला का और इसे ट्यूब में fertilize कर और इसे जन्म देने वाली माँ के गर्भ में प्रतिरोपित कर दिया जाता है. Gestational surrogacy में पिता के sperm और माँ के egg को fertilize कर किसी अन्य महिला (सरोगेट मदर) के गर्भ में प्रतिरोपित कर दिया जाता है.
आधुनिक युग में अमेरिका में १९७८ में IVF पद्धति से पहले टेस्ट ट्यूब बेबी लुइ ब्राउन का जन्म हुआ और कुछ ही महीनो बाद ३ अक्टूबर १९७८ को कलकत्ता में भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ,जिसका नाम रखा गया 'दुर्गा' .पर जिस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों में स्थान बनाया वह थी.२००४ में ,गुजरात के 'आनंद' नमक एक छोटे से शहर की एक महिला का लन्दन में रहने वाली अपनी बेटी के बच्चे को जन्म देना.
डॉक्टर का कहना है, हर वर्ष विश्व भर में करीब ५०० बच्चे ,सरोगेसी की प्रक्रिया से जन्म लेते हैं.उनमे करीब २०० बच्चे भारत में जन्म लेते हैं.जाहिर है,भारत की गरीबी और इसी सहारे अपना जीवन सुधारने की आकांक्षा लोगों को इसके लिए प्रेरित करती है. हर IVF क्लिनिक एक सरोगेसी एजेंसी से जुड़ी होती है. इसके एजेंट ,झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाली गरीब महिलाओं से संपर्क करते हैं और अपने जीवन स्तर सुधारने ,अपने बच्चों का भविष्य बनाने का एक अवसर मिलता देख,ये लोग एक अच्छी रकम ले बच्चे को जन्म देने को तैयार हो जाती हैं. क्लिनिक वाले इन महिलाओं का पूरा ख्याल रखते हैं पर पति की रजामंदी जरूरी होती है.उन्हें भी बुलाकर काउंसिलिंग की जाती है. फिर भी उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों की नाराजगी और पड़ोसियों की तानाकशी तो सुननी ही पड़ती है. लेकिन जब वे उन्हें एक साल के बाद अपनी झोपड़ी छोड़, अपने फ़्लैट में शिफ्ट होते और जीवन स्तर में सुधार देखते हैं तो कई अन्य महिलायें भी यह राह अपना लेती हैं.
भारत की तरफ आकृष्ट होने की कुछ वजहें और हैं. इस प्रक्रिया का कम खर्चीला होना. यहाँ एक बच्चे के जन्म में १० लाख से २५ लाख तक का खर्च आता है जबकि अमेरिका में यही खर्च बढ़कर ५५ लाख का हो जाता है. वैसे जन्म देने वाली माँ के हिस्से २,३ लाख रुपये ही आते हैं. ५०,००० एजेंट ले लेते हैं और बाकी पैसे प्रतिरोपण,दवाइयां और माँ की देखभाल में खर्च होते हैं.भारत में कानून भी उनके पक्ष में है वह सरोगेट माँ को नहीं बल्कि donors को ही बच्चे का कानूनी संरक्षक मानता है. इंगलैंड और ऑस्ट्रेलिया में जन्म देने वाली माँ को ही यह अधिकार प्राप्त है.फिर भारत में लोग बच्चे को सौंपने से इनकार नहीं करते.जबकि कई बार विदेशों में माँ ने बाद में इनकार कर दिया है,बच्चे को सौंपने से.
शिकागो के बेनहूर सैमसन ने २००६ में सरोगेसी कंसल्टेंसी शुरू की ,वे अमेरिका,इंग्लैण्ड ,कनाडा से इच्छुक दंपत्ति को भारत लाते हैं.उनका कहना है ४ साल में उनका बिजनेस ४०० गुणा बढ़ गया है.
यहाँ, बिलकुल गहरे श्याम वर्ण की लडकियां, विदेशी नाक नक्श के सफ़ेद गुलाबी बच्चों को जन्म देती हैं. डॉक्टर यशोधरा म्हात्रे का कहना है, 'गर्भ एक अवन की तरह है ,इसमें काला चॉकलेट केक बेक करना है या सफ़ेद वनिला केक यह आपकी मर्ज़ी पर है". पर यह सुन.मन थोड़ा सशंकित हो जाता है. बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया क्या इतनी मेकैनिकल हो सकती है.? अजन्मे बच्चे से भी माँ का एक जुड़ाव होता है.पर यहाँ अगर भावनाएं जुड़ी रहेंगी तो फिर माँ बच्चे से अलग कैसे हो पायेगी?
एक विचार यह भी सर उठाता है कि अपने बच्चे के इच्छुक माता-पिता के लिए इस से बड़े पुण्य का काम और क्या हो सकता है कि आप उनका ही अंश उनके गोद में सौंप सकें. चाहे हम एडॉप्शन की कितनी भी वकालत करें.पर इस से इनकार नहीं कर सकते कि हर स्त्री-पुरुष में अपने बच्चे को गोद में खिलाने की आकांक्षा होती है. कितने ही निःसंतान दंपत्ति की ज़द्दोज़हद देखी है.बरसों इलाज. स्त्रियों का अनेकों शारीरिक कष्ट से गुजरना और अगर विज्ञान उन्हें यह सुविधा मुहैया करवा रहा है. और इसी बहाने वह किसी के जीवन में सुधार लाने में भी सक्षम होते हैं तो क्या गलत है इसमें? पर भविष्य की एक भयावह तस्वीर भी खींच जाती है कि यह चलन आम ना हो जाए.और कहीं इसका दुरुपयोग ना शुरू हो जाए.आज मजबूरी में वे यह प्रक्रिया अपना रहें हैं,भविष्य में यह शौक ना बन जाए.
Saturday, 11 September 2010
Monday, 16 August 2010
Saturday, 7 August 2010
Thursday, 5 August 2010
Tuesday, 3 August 2010
तम्बाकू से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
यदि किशोर तम्बाकू के इस्तेमाल से बच कर रहें तो उनकी उम्र 20 वर्ष तक बढ़ सकती है।
भारत में प्रतिवर्ष 900,000 लोगों की तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मृत्यु हो जाती है।
भारत में 56.4 प्रतिशत पुरूषों और 44.9 प्रतिशत महिलाओं को कैंसर तम्बाकू के कारण होता है।
विश्व में मुंह के कैंसर के सबसे अधिक रोगी भारत मे हैं जिसका मुख्य कारण तम्बाकू है।
भारत में श्वास एवं फेफड़ों की बीमारी के 82 प्रतिशत मामले ध्रूमपान की वजह से होती है।
तम्बाकू अप्रत्यक्ष रूप से फेफड़ों की तपेदिक या टीबी को जन्म देता हैः ध्रूमपान न करने वाले लोगों के बजाय ध्रूमपान करने वाले व्यक्तियों में टीबी की संभावना तीन गुना ज्यादा होती है। जिन लोगों में जितनी अधिक बीड़ी, सिगरेट या अन्य कोई ध्रूमपान की आदत होगी उन्हें टीबी होने की आशंका उतनी ही अधिक होगी। ध्रूमपान करने वाले लोगों में टीबी से होने वाली मौत की संभावना भी ध्रूमपान न करने वालों से 3-4 गुना अधिक होती है।
ध्रूमपान करने वाले करीब आधे किशोरों की मृत्यु इससे हो जाएगी। (इनमें से करीब एक चैथाई की मृत्यु अपनी आधी उम्र में और एक चैथाई की मृत्यु बुढ़ापे में होगी)
यह अनुमान लगाया गया है कि दुनिया के किसी अन्य देश की तुलना में भारत में तम्बाकू जनित रोगों से मरने वाले लोगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है।
भारत में प्रतिवर्ष 900,000 लोगों की तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मृत्यु हो जाती है।
भारत में 56.4 प्रतिशत पुरूषों और 44.9 प्रतिशत महिलाओं को कैंसर तम्बाकू के कारण होता है।
विश्व में मुंह के कैंसर के सबसे अधिक रोगी भारत मे हैं जिसका मुख्य कारण तम्बाकू है।
भारत में श्वास एवं फेफड़ों की बीमारी के 82 प्रतिशत मामले ध्रूमपान की वजह से होती है।
तम्बाकू अप्रत्यक्ष रूप से फेफड़ों की तपेदिक या टीबी को जन्म देता हैः ध्रूमपान न करने वाले लोगों के बजाय ध्रूमपान करने वाले व्यक्तियों में टीबी की संभावना तीन गुना ज्यादा होती है। जिन लोगों में जितनी अधिक बीड़ी, सिगरेट या अन्य कोई ध्रूमपान की आदत होगी उन्हें टीबी होने की आशंका उतनी ही अधिक होगी। ध्रूमपान करने वाले लोगों में टीबी से होने वाली मौत की संभावना भी ध्रूमपान न करने वालों से 3-4 गुना अधिक होती है।
ध्रूमपान करने वाले करीब आधे किशोरों की मृत्यु इससे हो जाएगी। (इनमें से करीब एक चैथाई की मृत्यु अपनी आधी उम्र में और एक चैथाई की मृत्यु बुढ़ापे में होगी)
यह अनुमान लगाया गया है कि दुनिया के किसी अन्य देश की तुलना में भारत में तम्बाकू जनित रोगों से मरने वाले लोगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है।
Sunday, 25 July 2010
भारत के बूढ़े सबसे बदहाल
ऐसा मेरा मत है ? हों सकता है मै गलत ?
सिंगापुर स्थित संस्था इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने 40 देशों में मृत्यु की और बढ़ रहे लोगों के बारे में अध्ययन किया है जिसमें सबसे अंतिम स्थान पर भारत है जबकि ब्रिटेन पहले नंबर पर है.
भारत के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि वहाँ वृद्ध लोगों के लिए दर्दनिवारक दवाओं की उपलब्धता में सबसे बड़ी बाधा कड़े नियम क़ानूनों के कारण आती है जो दवाओं के अवैध इस्तेमाल को रोकने के लिए बनाए गए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार भारत में कई बड़े कैंसर अस्पतालों तक में डॉक्टर और नर्स दर्दनिवारक दवा मॉर्फ़िन के प्रयोग के बारे में ठीक से प्रशिक्षित नहीं हैं.
साथ ही रिपोर्ट तैयार करनेवाली संस्था के एक निदेशक टोनी नैश के अनुसार भारत और चीन जैसे देशों के बड़े आकार भी समस्या का कारण हैं.
सिंगापुर स्थित संस्था इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने 40 देशों में मृत्यु की और बढ़ रहे लोगों के बारे में अध्ययन किया है जिसमें सबसे अंतिम स्थान पर भारत है जबकि ब्रिटेन पहले नंबर पर है.
भारत के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि वहाँ वृद्ध लोगों के लिए दर्दनिवारक दवाओं की उपलब्धता में सबसे बड़ी बाधा कड़े नियम क़ानूनों के कारण आती है जो दवाओं के अवैध इस्तेमाल को रोकने के लिए बनाए गए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार भारत में कई बड़े कैंसर अस्पतालों तक में डॉक्टर और नर्स दर्दनिवारक दवा मॉर्फ़िन के प्रयोग के बारे में ठीक से प्रशिक्षित नहीं हैं.
साथ ही रिपोर्ट तैयार करनेवाली संस्था के एक निदेशक टोनी नैश के अनुसार भारत और चीन जैसे देशों के बड़े आकार भी समस्या का कारण हैं.
एड्स अब लाइलाज नहीं
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक डाक्टर ने एड्स की आयुर्वेदिक दवा बनाई है, जिसका भारत सरकार ने पेटेन्ट कर लिया है। कुशीनगर के वगहा खुर्द निवासी डा. संतोष कुमार ने ऑटोमोबाइल से इंजीनियरिंग के बाद आर्युवेदाचार्य की डिग्री ली और एड्स जैसी लाइलाज बीमारी के लिए लक्ष्मीगंज में अपना अनुसंधान कर विशुद्ध रप से हर्बल दवा बनाई। इससे 16 माह में ही एड्स से मुक्ति मिल सकती है।
जैनुल हसन फिरदौसी , अंबिकापुर ,सरगुजा
जैनुल हसन फिरदौसी , अंबिकापुर ,सरगुजा
Thursday, 22 July 2010
मामूली बिमारी नहीं है निमोनिया
निमोनिया... जिसे हम आमतौर पर मामूली बीमारी ही समझते आए हैं वो अब घातक रूप ले चुकी है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर घंटे निमोनिया से 45 बच्चों की मौत होती है। यानी करीब हर मिनट हमारे देश में एक बच्चा निमोनिया की भेंट चढ़ जाता है। इसलिए निमोनिया को मामूली बीमारी समझने की भूल न करें। निमोनिया कितना खतरनाक है आइए बताते हैं आपको खास रिपोर्ट में।
साइलेंट किलर...
जी हां, ये सच है। ये साइलेंट किलर हर मिनट हमारे देश में एक बच्चे की बली ले रहा है वो भी सिर्फ हमारी गलतफहमी की वजह से।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के इस बारे में आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
- हर घंटे निमोनिया की वजह से भारत में 45 बच्चों की मौत होती है।
- यानी हर मिनट करीब 1 बच्चे को निमोनिया मौत के मुंह में पहुंचा देता है।
- डब्ल्यूएचओ के मुताबिक भारत में निमोनिया से हर साल 4 लाख बच्चों की मौत होती है।
साफ है इस साइलेंट किलर के खूनी पंजे को रोकने के लिए हमें सख्त कदम उठाने पड़ेंगे।
चौंकाने वाले आंकड़ें
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक निमोनिया से जितने बच्चे हर साल दुनिया में मरते हैं, उनमें से 20 फीसदी बच्चे भारत के होते हैं। यानी दुनियाभर में निमोनिया से मरने वाले हर पांच बच्चों में एक बच्चा हिन्दुस्तानी होता है। इसकी एक बड़ी वजह गरीबी और निमोनिया को लेकर हमारी गलतफहमी है।
गौर कीजिए इन आंकड़ों पर भी...
भारत में 45 फीसदी बच्चों में पोषण की कमी है। उन्हें निमोनिया का बैक्टीरिया जल्दी अपने शिकंजे में ले सकता है। बीमारी के बारे में जानकारी की कमी होने की वजह से पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में निमोनिया को अक्सर बुखार समझकर उसका उपचार घर में ही किया जाता है। पहचान में देरी के बाद भी नज़दीक में अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपल्ब्ध ना होने की वजह से इलाज सही ढंग से नहीं हो पाता। निमोनिया की वैक्सीन होने के बावजूद भारत में वैक्सिनेशन की दर महज़ 50 फीसदी है। यानी देश के आधे बच्चों को वैक्सीन दी ही नहीं जाती।
किसी एक बीमारी से हमारे देश में इतनी मौतें नहीं होतीं जितनी निमोनिया से होती हैं। एड्स, मलेरिया और मीज़ल्स से सालाना मरने वाले कुल बच्चों की तादाद भी निमोनिया का शिकार होने वाले बच्चों से कम है। साफ है कि भारत को मामूली मानी जाने वाली इस जानलेवा बीमारी के खतरे से अब तो सचेत होना ही होगा।
लक्षण और इलाज
साइलेंट किलर निमोनिया पिछले कुछ दशकों में खतरनाक बीमारी के रूप में उभरी है। निमोनिया केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों के लिए भी सिरदर्द बना हुआ है। अमेरिका में हर साल 3 लाख लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं जिनमें से पांच फीसदी की मौत हो जाती है। आखिर कैसे होता है निमोनिया, क्या हैं इस बीमारी के लक्षण और क्या है इसका इलाज।
एक ऐसी बीमारी जो देखते ही देखते मरीज को अंदर से खोखला करने लगती है। अगर सही समय पर इलाज शुरू नहीं हुआ तो फिर ये बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है।
कैसे आते हैं न्यूमोनिया की चपेट में
निमोनिया एक प्रकार का संक्रमण है। हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच जाता है। कई बार फंफूद की वजह से भी लंग संक्रमित हो जाता है। अगर कोई व्यक्ति पहले से किसी बीमारी जैसे लंग डिजीज, हार्ट डिजीज से पीड़ित है तो उन्हें गंभीर संक्रमण यानी सीवियर निमोनिया होने का खतरा रहता है। हालांकि इस बीमारी का इलाज संभव है।
डॉक्टर के परामर्श से एंटीबॉयोटिक दवा लेने पर बीमारी से पूरी तरह से मुक्ति पा सकते हैं। एक स्टडी के मुताबिक एंटीबायोटिक दवाइयों की खोज से पहले निमोनिया की चपेट में आने वाले कुल मरीजों में से एक तिहाई मरीजों की मौत हो जाती थी।
क्या है लक्षण
सर्दी, हाई फीवर, कफ, कंपकपी, शरीर में दर्द, सिर दर्द, मांसपेशियों में दर्द निमोनिया के लक्षण हैं। छोटे या नवजात बच्चों में कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देता है। बच्चे देखने से बीमार लगें तो उन्हें निमोनिया हो सकता है।
क्या है बचाव
डॉक्टरी परामर्श से एंटीबायोटिक दवाएं लेकर निमोनिया को खत्म किया जा सकता है। निमोनिया के मरीज को सादा खाना खाना चाहिए और खूब पानी पीना चाहिए। मरीज को ऑयली, मसालेदार और बाहर के खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।
पिछले कुछ दशकों में निमोनिया का प्रकोप लगातार बढ़ा है। इस बीमारी बढ़ते प्रकोप को देखते हुए इस साल 2 नवंबर को पहली बार विश्व निमोनिया दिवस मनाया गया। दुनिया के करीब 20 देशों में ये दिवस मनाया गया ताकि बीमारी को लेकर न केवल आम लोगों को बल्कि डॉक्टरों व सरकारों को भी सचेत किया जा सके।
साइलेंट किलर...
जी हां, ये सच है। ये साइलेंट किलर हर मिनट हमारे देश में एक बच्चे की बली ले रहा है वो भी सिर्फ हमारी गलतफहमी की वजह से।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के इस बारे में आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
- हर घंटे निमोनिया की वजह से भारत में 45 बच्चों की मौत होती है।
- यानी हर मिनट करीब 1 बच्चे को निमोनिया मौत के मुंह में पहुंचा देता है।
- डब्ल्यूएचओ के मुताबिक भारत में निमोनिया से हर साल 4 लाख बच्चों की मौत होती है।
साफ है इस साइलेंट किलर के खूनी पंजे को रोकने के लिए हमें सख्त कदम उठाने पड़ेंगे।
चौंकाने वाले आंकड़ें
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक निमोनिया से जितने बच्चे हर साल दुनिया में मरते हैं, उनमें से 20 फीसदी बच्चे भारत के होते हैं। यानी दुनियाभर में निमोनिया से मरने वाले हर पांच बच्चों में एक बच्चा हिन्दुस्तानी होता है। इसकी एक बड़ी वजह गरीबी और निमोनिया को लेकर हमारी गलतफहमी है।
गौर कीजिए इन आंकड़ों पर भी...
भारत में 45 फीसदी बच्चों में पोषण की कमी है। उन्हें निमोनिया का बैक्टीरिया जल्दी अपने शिकंजे में ले सकता है। बीमारी के बारे में जानकारी की कमी होने की वजह से पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में निमोनिया को अक्सर बुखार समझकर उसका उपचार घर में ही किया जाता है। पहचान में देरी के बाद भी नज़दीक में अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपल्ब्ध ना होने की वजह से इलाज सही ढंग से नहीं हो पाता। निमोनिया की वैक्सीन होने के बावजूद भारत में वैक्सिनेशन की दर महज़ 50 फीसदी है। यानी देश के आधे बच्चों को वैक्सीन दी ही नहीं जाती।
किसी एक बीमारी से हमारे देश में इतनी मौतें नहीं होतीं जितनी निमोनिया से होती हैं। एड्स, मलेरिया और मीज़ल्स से सालाना मरने वाले कुल बच्चों की तादाद भी निमोनिया का शिकार होने वाले बच्चों से कम है। साफ है कि भारत को मामूली मानी जाने वाली इस जानलेवा बीमारी के खतरे से अब तो सचेत होना ही होगा।
लक्षण और इलाज
साइलेंट किलर निमोनिया पिछले कुछ दशकों में खतरनाक बीमारी के रूप में उभरी है। निमोनिया केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों के लिए भी सिरदर्द बना हुआ है। अमेरिका में हर साल 3 लाख लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं जिनमें से पांच फीसदी की मौत हो जाती है। आखिर कैसे होता है निमोनिया, क्या हैं इस बीमारी के लक्षण और क्या है इसका इलाज।
एक ऐसी बीमारी जो देखते ही देखते मरीज को अंदर से खोखला करने लगती है। अगर सही समय पर इलाज शुरू नहीं हुआ तो फिर ये बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है।
कैसे आते हैं न्यूमोनिया की चपेट में
निमोनिया एक प्रकार का संक्रमण है। हवा में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच जाता है। कई बार फंफूद की वजह से भी लंग संक्रमित हो जाता है। अगर कोई व्यक्ति पहले से किसी बीमारी जैसे लंग डिजीज, हार्ट डिजीज से पीड़ित है तो उन्हें गंभीर संक्रमण यानी सीवियर निमोनिया होने का खतरा रहता है। हालांकि इस बीमारी का इलाज संभव है।
डॉक्टर के परामर्श से एंटीबॉयोटिक दवा लेने पर बीमारी से पूरी तरह से मुक्ति पा सकते हैं। एक स्टडी के मुताबिक एंटीबायोटिक दवाइयों की खोज से पहले निमोनिया की चपेट में आने वाले कुल मरीजों में से एक तिहाई मरीजों की मौत हो जाती थी।
क्या है लक्षण
सर्दी, हाई फीवर, कफ, कंपकपी, शरीर में दर्द, सिर दर्द, मांसपेशियों में दर्द निमोनिया के लक्षण हैं। छोटे या नवजात बच्चों में कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देता है। बच्चे देखने से बीमार लगें तो उन्हें निमोनिया हो सकता है।
क्या है बचाव
डॉक्टरी परामर्श से एंटीबायोटिक दवाएं लेकर निमोनिया को खत्म किया जा सकता है। निमोनिया के मरीज को सादा खाना खाना चाहिए और खूब पानी पीना चाहिए। मरीज को ऑयली, मसालेदार और बाहर के खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए।
पिछले कुछ दशकों में निमोनिया का प्रकोप लगातार बढ़ा है। इस बीमारी बढ़ते प्रकोप को देखते हुए इस साल 2 नवंबर को पहली बार विश्व निमोनिया दिवस मनाया गया। दुनिया के करीब 20 देशों में ये दिवस मनाया गया ताकि बीमारी को लेकर न केवल आम लोगों को बल्कि डॉक्टरों व सरकारों को भी सचेत किया जा सके।
Friday, 16 July 2010
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